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12:434 सित॰

श्री कृष्ण के वचनों का मूल आत्मज्ञान

जन्माष्टमी का पर्व बालरूप कन्हैया के जन्म के साथ आत्मज्ञान से साक्षात्कार का भी

अध्यात्म का काम व्यक्ति को इज्जतदार बनाना नहीं है। इसका काम है उसे अपनी वास्तविकता दिखाना है। जन्माष्टमी के मौके पर समझें श्री कृष्ण के वचनों के मूल- आत्मज्ञान की अहमियत।

krishna arjun
कृष्ण अर्जुन संवाद

सत्य अत्यंत नाजुक होता है। अहंकार उसे अपनी सुविधा के अनुसार ही स्वीकार करना चाहता है। श्रीमद्भगवत गीता के चौथे अध्याय के 42वें श्लोक में कृष्ण संशय को काटने की बात करते हैं। यह संशय तब उत्पन्न होता है जब सत्य को समझाने के लिए कई बातें कही जाती हैं।


अज्ञान एक भीतरी बीमारी है। यह कोविड जैसी वैश्विक महामारी की तरह पीड़ा देती है। इसके उपचार की खोज सदियों से जारी है। इस खोज के परिणामस्वरूप अनेक उपचार प्रक्रियाएं और विधियां सामने आई हैं। इससे यह संशय पैदा हो जाता है कि कौन सा उपचार चुनें। कृष्ण के वचनों का मूल आत्मज्ञान है। इसी से मन का संशय उत्पन्न होता है। इस संशय को ज्ञान की तलवार से काटना और योग में स्थित होना ही मुक्ति का मार्ग है। मूल बात आत्म अज्ञान को ज्ञान से हटाना है। बाकी सभी बातें उसे स्पष्ट करने के लिए हैं। यदि व्यक्ति मूल बात से भटक जाए, तो वह एक ही श्लोक में कई दिशाओं में विचलित हो सकता है। यह विचलन 'विक्षेप' कहलाता है। यह दुख, बंधन और मोह का कारण बनता है। अहंकार सत्य को पूरी तरह स्वीकार नहीं कर पाता। वह उसे अपनी छोटी जेब में समाने लायक ही चाहता है। जब अहंकार दुनिया से पिटता है, तो वह सत्य की शरण में आता है, पर केवल आंशिक रूप से। सत्य की परिधि पर रहना और उसके मर्म को छोड़ देना अहंकार की चालाकी है। संशय कोई दुर्घटना नहीं। यह एक चालाकी है। इससे व्यक्ति सत्य के पास होने का दावा करता है, पर उसकी कीमत नहीं चुकाता। धर्म से दूर रहने वाले से अधिक खतरनाक वह है जो धर्म के नाम पर बाहरी बातों में उलझकर मर्म से भटक जाता है। आत्मज्ञान ही अध्यात्म के पूरे शरीर की स्रोत कोशिका है। इसके बिना सभी विधियां निर्जीव हैं।


संशय के दो तल

संशय के दो मुख्य तल होते हैं। पहला, स्थूल संशय है। इसमें व्यक्ति सत्य की अपेक्षा संसार की विविधताओं को अपनाता है। यह तब होता है जब शिक्षक की बात से सहमत होने के बावजूद, व्यक्ति अपनी अन्य धारणाओं को भी महत्व देता है। दूसरा, सूक्ष्म संशय है, जो अधिक घातक है। इसमें व्यक्ति सत्य से संबंधित बाहरी बातों को पकड़कर उसके केंद्र को छोड़ देता है। उदाहरण के लिए, गीता के मूल संदेश को छोड़कर उसकी शाखाओं-प्रशाखाओं में उलझ जाना। यह संशय तब और भी मुश्किल हो जाता है जब ये बाहरी बातें भी कृष्ण के ही वचनों से संबंधित हों। ऐसे में व्यक्ति को लगता है कि वह धर्म का पालन कर रहा है, जबकि वह मूल से भटक चुका होता है।


आत्मज्ञान का महत्व

आत्मज्ञान अध्यात्म का मूल है। यह शरीर में 'स्टेम सेल' (स्रोत कोशिका) जैसा होता है। यह पहली कोशिका है जिससे पूरा शरीर निर्मित होता है। यदि यह स्रोत कोशिका स्वस्थ है, तो पूरा आध्यात्मिक शरीर स्वस्थ रहेगा। आत्मज्ञान ही अध्यात्म की सभी विधियों को प्राण प्रतिष्ठा देता है। इसके बिना भजन, ध्यान और प्रेम जैसे सभी आध्यात्मिक कार्य निर्जीव हो जाते हैं। आत्मज्ञान होने पर प्रतिपल एक नई विधि स्वतः स्फूर्त उत्पन्न होती है। यह किसी ग्रंथ में बताई गई 112 विधियों से कहीं अधिक है। आत्मज्ञान का अर्थ स्वयं को जानना है, जो किसी किताब में नहीं लिखा जा सकता।


अविद्या से विद्या तक

बाहर से आने वाली हर बात अविद्या है, चाहे वह कितनी भी ऊंची क्यों न हो। बड़े से बड़े विद्वान के वचन भी तब तक अविद्या हैं, जब तक उनका स्वयं से रिश्ता न बने। ग्रंथ विशेष प्रकार की अविद्या होते हैं। वे हमें विद्या की ओर प्रेरित कर सकते हैं। वे बाहरी होते हुए भी हमें भीतर देखने की संभावना देते हैं। विद्या किसी किताब में नहीं लिखी जा सकती। यह एक गतिशील अनुभव है। आत्मज्ञान भी कोई स्थिर वस्तु नहीं। यह जो हो रहा है उसको देखना है। इसे ईमानदारी से कीमत चुकाकर स्वयं को देखकर प्राप्त किया जाता है। यह कीमत है स्वयं को देखकर घृणा महसूस करना। अहंकार हमें जैसा मानता है, हम उससे कहीं अधिक सड़े-गले हैं।


अहंकार और मुक्ति

अध्यात्म का काम व्यक्ति को इज्जतदार बनाना नहीं है। इसका काम है उसे अपनी वास्तविकता दिखाना। आत्मज्ञान में व्यक्ति अपनी बेइज्जती को जानता है। वह स्वयं पर हंसना सीखता है। अपनी मूर्खता और दुख पर हंसना ही आनंद है, क्योंकि अहंकार गंभीरता पर पलता है। स्वाभिमान जैसे शब्द व्यक्ति को भ्रमित करते हैं। ये मुक्ति में बाधा डालते हैं। स्थूल माया से बचने के बाद भी लोग सूक्ष्म माया में फंस जाते हैं। सूक्ष्म माया अध्यात्म में बहुत कुछ होने का भ्रम है, जबकि सत्य केवल 'मैं' है। धर्म के नाम पर बाहरी बातों में उलझना सूक्ष्म चालाकी है। यह धर्म से दूर रहने वाले से भी अधिक खतरनाक है।


आचार्य प्रशांत के सत्र का अंश

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