Sri Krishna Janmashtami: बोध स्वरूप श्री कृष्ण
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के मौके पर 5253 साल के हुए कृष्ण का वास्तविक स्वरूप क्या?
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन पूरी दुनिया में कान्हा के जन्म का उत्सव मनाया जा रहा है। जन्म के 5253 साल होने के अवसर पर दूध, दही, मक्खन समेत तमाम सामग्रियां जुटाई जा रही हैं, लेकिन क्या सचमुच कृष्ण वही हैं, जिन्हें हम बाल रूप या अर्जुन के सखा या गोपियों के बीच पाते हैं। नहीं बात इससे कहीं आगे की है...

त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् |
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप||
आचार्य प्रशांत के वक्तव्य से
श्रीमद् भगवत गीता के चौथे अध्याय में कृष्ण के वास्तविक स्वरूप और ज्ञान योग पर विस्तार से बात की गई है। कृष्ण देह से परे बोध मात्र हैं।
कृष्ण ने बताया कि उन्होंने यह अव्यय योग पहले विवस्वान (सूर्य) को दिया था। विवस्वान ने मनु को, और मनु ने इक्ष्वाकु को यह ज्ञान दिया। इस प्रकार यह ज्ञान राजाओं, ऋषियों और विद्वानों में परंपरा से बढ़ता रहा। हालांकि, यह ज्ञान आजकल खो सा गया है। कृष्ण अब अर्जुन को यह उत्तम रहस्य बता रहे हैं, क्योंकि अर्जुन उनके भक्त और सखा हैं।
अर्जुन को कृष्ण अपने मित्र और समकक्ष मानते थे। इसलिए उन्हें कृष्ण का सूर्य को उपदेश देने का दावा अविश्वसनीय लगा। कृष्ण ने समझाया कि अर्जुन स्वयं को समय की धारा में एक सीमित कालखंड में देखते हैं। वे देह नहीं, बल्कि प्रकृति की धारा के पार खड़े बोध मात्र हैं। कृष्ण ने कहा कि उनकी देह बदलती रहती है, पर बोध एक ही रहता है। सूर्य को उपदेश देने वाला बोध ही कृष्ण है। हर वह व्यक्ति कृष्ण है जो बोध में जीता है। अर्जुन के सामने खड़े कृष्ण उनका एक विशेष रूप हैं। यह रूप भी नश्वर है, जैसे अर्जुन की देह। कृष्ण के अनंत रूप हैं, पर उनका मूल स्वरूप बोध है।
कृष्ण का वास्तविक स्वरूप
कृष्ण बोध स्वरूप हैं, जो कालातीत और जगत की उत्पत्ति के समय भी थे। वे देह, रूप, नाम, काल या गुण से परे हैं, केवल बोध मात्र हैं। कृष्ण ने स्वयं को जन्म रहित, अविनाशी और अव्यय आत्मा बताया है। वे सब प्राणियों के नियामक ईश्वर होने पर भी अपनी माया से जन्म ग्रहण करते हैं। वे प्रकृति की धार के स्रोत पर बैठे हैं और उसी धार में प्रकट भी होते हैं। यह उनकी माया है, जैसे शिव गंगा की गंगोत्री और तट दोनों पर होते हैं। कृष्ण इस पूरे खेल के संचालक हैं और स्वयं एक मोहरा भी बन जाते हैं।
प्रकृति और चुनाव का महत्व
प्रकृति की धारा कार्य-कारण की श्रृंखला है, जहां जन्म और मृत्यु होते हैं। समय परिवर्तन को नापने की व्यवस्था है, और परिवर्तन के लिए कारण आवश्यक है। सत्य वह आदि कारण है जहां यह कार्य-कारण श्रृंखला रुक जाती है। चेतना प्रकृति की धारा में उठती और गिरती है, यह चुनाव कर सकती है। एक चुनाव धारा में रहकर भौतिक सुखों में लिप्त रहना है। दूसरा चुनाव तटस्थ होकर किनारे लगना है। जो धार में फंसा है वह अर्जुन है, जो किनारे लग गया उसका नाम कृष्ण है। कृष्ण का कोई चेहरा नहीं होता, या उनके अनंत चेहरे हो सकते हैं। बोध का जो भी रूप है, वह कृष्ण का ही रूप है।
ईश्वर, धर्म और अध्यात्म
वेदांत में ईश्वर और प्रकृति दोनों को माया माना गया है। ईश्वर प्रकृति की व्यवस्था का नियामक है, पर वह सत्य नहीं है। धर्म ईश्वर को पूजता है, जबकि अध्यात्म सत्य की खोज करता है। ईश्वर की पूजा भौतिकता है, जबकि अध्यात्म का संबंध असत्य के नकार और सत्य को समर्पण से है। अध्यात्म में अहंकार का नमित होना ही सच्ची पूजा है। धार्मिक लोग अक्सर अध्यात्म को अपने लिए खतरा मानते हैं। अध्यात्म तीखे सवालों और निर्मम जिज्ञासाओं पर आधारित है। धर्म इन जिज्ञासाओं के आगे ठहर नहीं पाता, जिससे धार्मिक लोग क्रोधित होते हैं।
कृष्ण का अवतरण और गीता का सार
कृष्ण का प्रकट होना मानव के चुनाव पर निर्भर करता है। जब धर्म की हानि होती है और अधर्म बढ़ता है, तब कृष्ण प्रकट होते हैं। यह मानव का चुनाव है, कृष्ण का फैसला नहीं। जब दुख बहुत बढ़ जाता है, लोग विवश होकर कृष्ण को याद करते हैं। यह उनकी चीख-पुकार और चुनाव है जो सत्य को प्रकट करता है। कृष्ण बाहर से नहीं, बल्कि भीतर से आते हैं, जब व्यक्ति का बोध जागृत होता है। आपका अपना कृष्णत्व ही कृष्ण का अवतरण है। अवतारवाद ने भारत को नुकसान पहुंचाया है, क्योंकि लोग बाहरी मुक्तिदाता की प्रतीक्षा करते हैं। गीता का ज्ञान उसे मिलता है जो जीवन में बड़ी चुनौती स्वीकारता है। पूरी गीता एक प्रेम पत्र है जो कृष्ण को चाहने का आह्वान करती है।
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