Shanti Swarup Bhatnagar एक ऐसी विभूति हैं, जिनमें वैज्ञानिक चेतना के साथ कवि हृदय का दुर्लभ संयोग मिलता है। काशी के विश्वस्तरीय संस्थान BHU की कुलगीत ऐसी रचना है, जो बेमिसाल है। 19 साल तक यूनिवर्सिटी प्रोफेसर रहे डॉ भटनागर 1921 से 1940 तक सेवाएं देते रहे। पहले बीएचयू में सेवाएं देने के बाद वे पंजाब यूनिवर्सिटी से जुड़े।
कई मायने में ‘फर्स्ट इन इंडिया’ रहे डॉ भटनागर
1894 में जन्मे डॉ शांति स्वरूप भटनागर का जीवन काल महज 61 साल का ही रहा, लेकिन आजाद भारत में कई ऐसी चीजें रहीं, जो पहली बार डॉ भटनागर के नेतृत्व में हुईं। भटनागर वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) के संस्थापक निदेशक रहे। स्वतंत्र भारत में CSIR को अनुसंधान की प्रमुख एजेंसी के रूप में पहचाना जाता है। डॉ भटनागर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के पहले अध्यक्ष भी रहे।
पंडित नेहरू ने डॉ भटनागर के बारे में क्या कहा?
देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने डॉ शांति स्वरूप भटनागर के बारे में कहा था, मैं कई प्रमुख हस्तियों के साथ कई तरीकों से जुड़ा रहा हूं, लेकिन डॉ. भटनागर कई चीजों का विशेष संयोजन थे। इसमें चीजों को हासिल करने के उत्साह के साथ एक जबरदस्त ऊर्जा भी शामिल थी। परिणाम यह हुआ कि उन्होंने उपलब्धि का ऐसा रिकॉर्ड छोड़ा जो वास्तव में उल्लेखनीय है।
निधन से 34 साल पहले भारत लौटे
विदेश में रिसर्च के बाद भटनागर अगस्त 1921 में भारत लौटे। उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) रसायन विज्ञान के प्रोफेसर के रूप में ज्वाइन किया। भटनागर बीएचयू में तीन साल तक रहे और इस छोटी सी अवधि में उन्होंने भौतिक-रासायनिक अनुसंधान स्कूल की शुरुआत की।
वैज्ञानिक चेतना के साथ कवि हृदय
वैज्ञानिक होने के बावजूद डॉ शांति स्वरूप भटनागर साहित्य की रचना भी करते थे। इसकी मिसाल है BHU का शानदार ‘कुलगीत’ (विश्वविद्यालय गीत)। बीएचयू के तत्कालीन वाइस चांसलर जस्टिस एनएच भगवती ने उनके बारे में कहा था, ‘आप में से शायद बहुत से लोग यह नहीं जानते होंगे कि प्रोफेसर भटनागर एक प्रख्यात वैज्ञानिक होने के साथ-साथ हिंदी के जाने-माने कवि भी थे। अपने बनारस प्रवास के दौरान उन्होंने ‘कुलगीत’ की रचना की। विश्वविद्यालय… प्रो. भटनागर को श्रद्धा के साथ याद करता है। उन्हें इसी तरह याद किया जाता रहेगा। बता दें कि बीएचयू की स्थापना 1916 में पंडित मदन मोहन मालवीय ने की।
भटनागर का उत्कृष्ट योगदान
1936 में ब्रिटिश सरकार ने pure and applied chemistry में डॉ भटनागर के उत्कृष्ट योगदान को सम्मानित किया। भटनागर को ऑर्डर ऑफ ब्रिटिश एम्पायर (OBE) से सम्मानित किया गया। युद्ध के उल्लेखनीय प्रयासों के लिए भटनागर को 1941 में नाइट की उपाधि दी गई। 1943 में सोसाइटी ऑफ केमिकल इंडस्ट्री, लंदन की तरफ से भटनागर को मानद सदस्य और बाद में उपाध्यक्ष चुना गया।
पद्म भूषण Shanti Swarup Bhatnagar
साल 1943 में उन्हें रॉयल सोसाइटी, लंदन का फेलो चुना गया। डॉ भटनागर इंडियन केमिकल सोसाइटी, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ साइंसेज ऑफ इंडिया और इंडियन नेशनल साइंस कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे। एक जनवरी, 1955 को निधन से लगभग एक साल पहले डॉ भटनागर को 1954 में भारत के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।
पढ़िए डॉ भटनागर की बेमिसाल रचना- BHU कुलगीत

